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Sunday, August 31, 2014

हरे काँच की चूड़ियाँ

Pic by PD



उस दिन कुछ कागजात ढूंढते हुए वो पुराना लकडी का बक्सा मिला , खोला तो उसमे दो काँच की चूड़ियो के टुकड़े मिले हरे काँच की , तो सब काम छोड़ कर बस बक्सा लेकर बैठ गया , और भूल गया की क्या ढूंढ  रहा था , फिर अतीत में झाँकने की कोशिश करने   लगा .

कोई कॉमन फ्रेंड के यहाँ शादी में मिली थी वो कई साल हो गए , शहर छोड़ने के बाद सालों बाद या फिर स्कूल छोड़ने के बाद वो मिली थी , वैसे खबर लगती रहती थी , घ्रर में कभी कबार जिक्र हो जाता था , आखिर बचपन साथ ही गुजारा था , वो ही स्कूल , मोहल्ला , घर वालों का आपस में मेल जोल तो था ही.
मिले पुरानी यादें ताज़ा करी सुख दुःख बांटे वगैराह वगैराह ,अच्छी लग रही थी , हमेशा की तरह , फिर रात को म्यूजिकल प्रोर्ग्राम था , गाना बजाना , डांस भी हुआ  , तभी डांस करते हुए उसका हाथ कहीं टकराया और २-३ चूड़ियाँ टूट गयी , लेकिन वो इतनी मगन थी की ध्यान भी नहीं दिया , तब मेने वो चूड़ियों के टुकड़े उठा कर अपनी जेब में रख लिए , लेकिन मेने ऐसा क्यों किया , मुज़हे कभी समझ नहीं आया , बाद में उन टुकड़ों को देखा वो हरे कांच की चूड़ियों के टुकड़े थे , तब गौर से देखा उसने खूब साडी चूड़ियाँ डाल रखी थी , ज्यादातर हरे कांच की , बहुत खूबसूरत , मन तो किया अभी हाथ  थाम लूं , उन्हें छू कर देखूं . जिन्हे बचपन में कितनी ही बार थामा होगा .लेकिन तब सोचा न था की वो  हाथ मैं  अब थाम नहीं सकता था , देर हो गयी थी .
एक वजह और भी हो सकती है उन चूड़ियों के टुकड़े सँभालने की , हुआ यूँ की बचपन की बातें करते हुए उसने बताया की उसे अच्छा लगा था जब मैने उसकी फ्राक पर स्याही छिड़क दी थी गुस्से में .अच्छा लगा सुन कर , और में  और वो दोनों ही nostalgic मूड में चले गए .

एक ही स्कूल में जाते थे , अधिकतर साथ ही बैठते थे , वो पढ़ने में होशियार थी होमवर्क करने में हमेशा मदद भी करती थी , मेरे घर में मुज़हे ताने भी सुंनने पड़ते थे की ये ना हो तो लाटसाहब कभी पास ही ना हो , तब में अपना गुस्सा उसपर निकालता था , लेकिन थोड़ी देर बाद फिर वो ही , बचपन भी अजीब होता है , पल में तोला पल में माशा , सब भूल जाता है , लेकिन स्कूल छोड़ने के बाद में सब कुछ  भूल जाऊंगा , सोचा ना था .खैर किस्सा ऐसा था की शहर में मेला लगा था हफ्ते भर तक , सब रात को मेले में जाते थे वो भी जाती थी अपने घर वालों के साथ , उस रात भी गयी थी , में भी अपने दोस्तों के साथ गया था , दुसरे दिन क्लास में पंडित माड़साब ने होम वर्क पूछा तो कई और के साथ मुज़हे भी खड़ा होने पड़ा , लेकिन वो बैठी रही , होम वर्क जो कर के लाई थी , तब मुज़हे गुस्सा आया , उस दिन माड़साब ने हथेली लाल कर दी थी खड़े फुट्टे से , स्कूल के बाद उसने मेरा हाथ पकड़ कर देखने की कोशिश करी की कितनी लगी है , लेकिन में कहाँ मानने वाला था इतना जल्दी , मुज़हे समज़ नहीं आ रहा था वो भी कल मेले में थी फिर होमवर्क कब कर लिया , लेकिन वो थी ही ऐसी .मैने बात नहीं करी और घर चला गया .

तब कोचिंग क्लासेज तो होती नहीं थी , तब हम 5-10 बच्चे पास ही रिटायर्ड हनुमान माड़साब के यहाँ पड़ने जाते थे शाम को , घर वाले भी सोचते थे जान छूटे , वहां तो शांति से बैठेंगे नहीं तो यहीं दोस्तों के साथ बस आवारागर्दी करते रहेंगे , हनुमान माड़साब काशी , मथुरा के पंडों जैसे दिखते थे , मास्टरनी भी मोटी सी थी , उनके बच्चे नहीं थे ,माड़साब धोती और  ऊपर घर में अधिकतर कुछ नहीं पहनते थे , दूध के और दाल में खूब सारा देसी घी डाल कर पीने के शौकीन थे , तब ज्यादा कैलोरी calculation नहीं होती थी , हमें भी कभी कभी खिलाते पिलाते रहते थे खास  कर खीर , या आटे का हलुवा .माड़साब तब फीस नहीं लेते थे कहते थे पेंशन से काम चल जाता है , और किस के लिए बचाना है , माँ फीस की जगह कभी आटा , चावल , तेल या देसी घी घर में रखवा देती थी , डैडी जिन्हे वो डागदर साहेब कहते थे कभी बीमारी में उनका इलाज़ कर देते थे .
माड़साब बैठे बैठे टेड़े मेढे होकर बम छोड़ते रहते थे और हम सब दबी जबान में हँसते थे , कई बार गिनते भी थे , माड़साब के यहाँ कलम और दवात चलती थे , और मेरे हाथ हमेशा गंदे और स्याही से सने रहते थे , था भी तो बेतरतीब , खैर उस दिन जब में गुस्से में था और वो वो एक सफ़ेद पर पिंक फूलों वाली फ्राक में थी तब ,टुएशन के बाद मैने उसकी फ्राक पर स्याही छिड़क कर अपनी भड़ास निकाली , की मैने होमवर्क नहीं किया तो तूने क्यों किया , बस ये ही बात , बाद में मुज़हे घर पर भी सुनना पड़ा था , उसकी माँ ने जो मेरी complaint  करी थी .
लेकिन दुसरे ही ही दिन हम फिर दोस्त बन गए , बचपन होता ही ऐसा है , ये तो जब हम अपने teens में आने के बाद 30-35 तक सब को भूल कर अपने में खो जाते हैं , नए रिश्तों में , दोस्तों में और अपने करियर में , हम उन सब लोगों को भूल जाते हैं जिन्होंने नींव रखी , मजबूत किया , संस्कार दिए , मुज़हे याद है मैने बड़े होने के बाद कभी जानने की कोशिश ही नहीं करी की हनुमान माड़साब कैसे हैं , बस एक बार पता लगा नहीं रहे , बस इतना ही !!

उस दिन उसने बताया की उससे उसकी फ्राक के ख़राब होने का दुख तो हुआ था लेकिन ये अच्छा लगा था की होमवर्क तो औरों ने भी नहीं किया था लेकिन उसका सिर्फ उस पर ही गुस्सा होना उसे अच्छा लगा था , इतने सालों बाद वो सुनकर बहुत अच्छा लगा ,.फिर वो टुकड़े ..., शायद , पता नहीं .फिर क्यों कभी पता नहीं किया उसके बारे में , कहाँ है , क्या कर रही है , एक स्टेज के बाद ही पता लगता है क्या छूटा , क्या पाया , ये ही तो ज़िन्दगी है ..सब कुछ ऐसा थोड़ी होता है जैसा हम चाहते हैं , या फिर ऐसा भी होता है जो छूट गया उसे ही हम तलाशते हैं ,

Saturday, February 8, 2014

परिंदे

कई दिन हो गए परिंदों के feeder में दाना नहीं डाला
शोर भी नहीं हो रहा नहीं तो वो सुबह से लेकर शाम तक शोर मचाते रहते थे
घर पर सब कहते थे की कितना शोर मचाते हैं कई बार सुबह सुबह सोने भी नहीं देते
आज कल काम बहुत है , वक़्त नहीं मिल रहा , monetary  सपने जो chase  कर रहा हूँ
थक कर सो जाता हूँ बस , लेकिन कई दिनों से नोटिस किया , नींद ही नहीं आ रही
सोचा क्या वज़ह हो सकती है , काम से तो कभी ऐसा पहले हुआ नहीं , होता रहता है , लाइफ का routine  है फिर ?
कहीं और कोई कमी तो नहीं , या शायद वो परिंदों की आवाज़े जो अब नहीं आती वज़ह हो सकती है
सोचता हूँ दोबारा feed करना शुरू करूं , सुनूँ उस शोर को ,महसूस करूं फिर से
शायद  वो याद दिला  रहे  हों  की वो भी एक  जरूरी  part  हैं मेरी लाइफ के
लगता है ये ही सच है और वज़ह भी i

गीली मिट्टी

Short Story : While chatting with my niece on Whats'up , I just texted few lines to her spontaneously , then thought why not post it , added few more lines , and here it is ;

कल रात को सोते हुए ऐसा लगा कि दरवाज़े  पर  कोई है .
सोचा रात को इतनी देर कौन हो सकता है
दरवाज़ा खोल कर देखा कोई नहीं था
वापस बंद करने लगा तो देखा की फर्श पर लाल गीली मिट्टी के कुछ निशान बने हुए थे
जैसे कोई लाल गीली मिटटी   से सने पांव के निशान छोड़ गया
लाल मट्टी और यहाँ , कैसे , यहाँ तो होती नहीं , फिर ?
लगता है कोई गाँव से आया होगा
क्या कोई मुझे याद दिलवाना चाहता है उस मिट्टी की
कहीं मैं वो सब भूल तो नहीं गया
कौन होगा या होगी ?

Sunday, December 29, 2013

कशमकश













आखिर अरूंधति ने पूछ ही लिया की क्या बात है कुछ खोयी हुई हो , हुआ यूँ की आश्विन अपने एक दोस्त और उसकी वाइफ अरूंधति जो मेरी भी अच्छी  दोस्त है के साथ हम यहाँ हिल स्टेशन पर घूमने आये हुए हैं ,शादी को सात साल हो गए हैं , सोचा चलो बाहर चलते हैं , कल शाम को गार्डन पार्टी चल रही रही थी , लेकिन पता नहीं अचानक मन कुछ अकेला रहने को कर रहा था , जैसे की कुछ याद करना चाहता हो , कुछ तलाश में था , पार्टी अच्छी होते हुए भी कुछ कमी लग रही थी , जिसे शायद उसने नोटिस किया होगा , शायद .

देर रात हो गयी थी सोचा कल सोचेंगे , तो सुबह जल्दी उठते ही मैने शाल लपेटी  और बाहर आ गयी तब आश्विन सो रहा था , सोचा क्यों डिस्टर्ब करूं , वैसे भी वो सोते हुए एकदम भोला सा एक दम carefree  लग रहा था , अब Bombay  में तो ऐसी नींद आने से रही , ऑफिस टेंशन .

मौसम ठंडा था होटल हिल टॉप लोकेशन पर है , सब तरफ हरियाली है , तो नीचे तरफ लेक साइड वाली कच्ची सड़क पकड़ी , सुबह सुबह परिंदों ने शोर मचाना शुरू कर दिया था , में तो मेहमान थी उनके यहाँ घर तो उनका ही है ,निकली थी ये सोच कर की शायद सूकून मिले खुली हवा में और जान सकूं की क्यों कल मन नहीं लग रहा था , लेकिन ध्यान बार बार परिंदों की और चला जाता था , तब समझ आया की ये परिंदे किसकी याद दिल रहे हैं कुछ दिन पहले हर्ष का US  से फ़ोन आया था की वो कुछ दिन के लिए India  आ रहा है मिलना चाहता है , पूछा भी की मेरा नंबर कहाँ से मिला , लेकिन बताया नहीं , हुआ यूँ की कई साल पहले उसके US जाने के पहले और मेरी शादी के पहले कभी कभी उसका फ़ोन आता था और कई बार ऐसा हुआ की बैकग्राउंड में हमेशा परिंदों की आवाजें आती थी तो मैने पूछा  भी  ये परिंदे हमेशा तुम्हारे साथ चलते रखे हैं क्या , तो वो हॅस दिया , लगता है इन आवाजों ने उसकी याद ताज़ा कर दी .

 शायद कल मुझे कुछ आभास होने लगा था , पता नहीं .हमारे बीच वैसे तो कुछ कभी भी नहीं रहा , स्कूल छूटने के बाद शायद ही कभी देखा हो उसे , फिर क्यों ? उसका वो ही स्कूल वाला चेहरा तो याद रहता है हमेशा , प्राइमरी में थे हम दोनों , साथ ही बैठते थे लकड़ी की बेंच पर जो की स्याही से पूरी बदरंग हो गयी थी , सरकारी स्कूल जो था , वो हमेशा क्लास में लेट आता था , मुझे चोटी वाले  माड़साब को हमेशा सफाई देनी पड़ती थी की वो बाहर ही है बस आ रहा है , फिर वो दरवाजे पर हांफता भागता हुआ आता था , बुशकोट आधी बाहर , बाल सामने , घर से तो टाइम पर निकलता था लेकिन बस अटक जाता था रास्ते में कहीं भी कभी कंचे , गिल्ली डण्डा , या कोई मदारी खेल , तब उसे डांट पड़ती देर से आने पर रोज की तरह और मुजहे भी की तुम इसे घर से क्यों नहीं साथ लाती , लेकिन उसका घर स्कूल से दूसरी तरफ था , फिर कैसे .अच्छा तो फिर सब करना पड़ता था , पेंसिल छील कर दो , पता नहीं क्या करता था कई बार बोला ऊपर वाला हिस्सा मत खाया कर , कैसा था वो कुछ अजीब . खाना खाता तो ऐसा कभी नहीं हुआ की बुशकोट ख़राब नहीं करी हो हमेशा गिराता था , उसकी ये बेतरतीब तरीका  मुझे हमेशा  उसकी याद दिलाता है , कई बार में सोचती हूँ की आश्विन ऐसा क्यों नहीं करता , वो एक बहुत ही सलीके से खाने वाला , और सब काम भी एकदम systematic , और एक वो , तब मन करता था की इनका भी खाने में कुछ फैले तो अच्छा लगे , तब मन करता है कोई अच्छी सी ड्राइंग बनाये और में उसे बिगाड़ दूं.कई बार हम स्कूल से छूटने पर गावं के तालाब की तरफ चले जाते थी वहाँ वो पानी में पत्थर को तैराने की मतलब ५-७ टप्पे खिलाने की कोशिश करता रहता था .

आज मैने भी सोचा चलो लेक में try करके देखते हैं ये सोचकर में लेक तक आ गयी , कोशिश करी लेकिन पत्थर 2 टप्पे भी नहीं ले पाया , कहाँ वो 5 -7  कर लेता था .स्कूल पूरा होने  के बाद हम ने वो गावं भी छोड़ दिया बाद में उसे बस एक दो बार देखा होगा बड़े होने के बाद , लेकिन वो ज्यादा याद नहीं लेकिन उसका बचपन का साथ हमेशा कुछ याद दिलाता रहता है जब भी कभी किसी को कुछ वैसा ही करते देखती हूँ तो जैसे की उसकी आधी बाहर शर्ट , ख़राब  पेंसिल , कभी किसी बच्चे की कई बार मैने अनजाने में ही शर्ट बाहर निकाल दी फिर हंसी भी आयी की ये  क्या हो जाता है मुझे .

इतने सालों बाद उसके कॉल ने शायद मुझे  वापस उस वक़्त में पहुंचा दिया , मन बेचैन था शायद इस लिए अब कैसा होगा वो , क्यों मिलना चाहता  है , शादी करी की नहीं क्या वो भी मुझे याद करता होगा , अब लगता है करता होगा , नहीं तो कहीं से No. मालूम करके कॉल क्यों करता , ये ही कशमकश शायद बेचैन कर रही है .
क्या करूं उसे जवाब दूं मिलने का या फिर बहाना बना दूं.
देर हो रही है वापस चलना चाहिए , सब नाश्ते पर इंतज़ार कर रहे होंगे.

Saturday, December 28, 2013

सपना : Dream



एक   सपना  जन्म् ले  रहा  हे  ,  बरसों  तक  कहीं  दबा  पड़ा  था  , बीच  बीच  में  कभी  कभार  बाहर  आता  था   लेकिन  फिर  कहीं  खो  जाता  था .
सपने  में  पानी  है  हरियाली  है   बड़े बड़े  दरख़्त  हैं  , शायद  कच्ची  मिटटी  से  बना  है  ये  सपना  ,तो  परिंदो  ने  भी  पूछा  कि  क्या  उनके  लिए  भी  वहाँ  कोई  जगह  है  या  रखी  है  , अब  डिमांड  आयी  है  तो  ख्याल  तो  रखना  पड़ेगा  .
सोचता  हूँ  कि  क्यों  ना  सपने  को  थोड़ी  धूप  दिखाई  जाये  , खुल  के  आने  दो  सामने  ,कोई  आकार  दूं  , हवा  लगने  दूं   , उड़ने  दूं  उसे  , क्यों  बांध  रखा  है  , जाने  दो  , और   फिर  उसे  आज़ाद  छोड़ने  के  बाद  पकड़  पाओ  तो  वो  तुम्हारा  , नहीं  तो  समझो  गया  , खो गया ,शायद  ज्यादा  कोशिश  नहीं  करी  .
अच्छी   बात  ये है  इस  सपने  में कोई  चेहरे   नहीं  हैं  , हमेशा  कि  तरह  , अगर  हैं   भी  तो  वो  अनजान  हैं  .सपने  में  एक  गौंव   वाली  गरीब  सी  औरत  दिखती  है  शायद  राजस्थान  से  , " Lekin " की  डिंपल  जैसी  , पूछती  है  क्या  वो  अपने  मिटटी  के  चूल्हे  के  साथ  आ  सकती  है  ,कसम से  दीवारें  काली  नहीं  करूंगी   ,  और   कहती  है  कभी  मोटी  रोटी  खा  कर  देखना  मेरी .बाल  उसके  भी  उलझे  रहते  हैं  , चेहरा   धूप  से  झ़ुलस  गया  है  लेकिन  फिर  भी  चमकता  है  ,चहरे की लकीरें  एक  ज़िन्दगी  बयां  करती  हैं .
और  कौन  कौन  जुड़ा  है  इस  सपने  से  , बस  एक  सुकून  देता  है  , एक  उम्मीद  जगाता  है  hey की  अभी  बहुत  कुछ  करना  बाकि  है  शायद  फिर कहूँ  “ Life has just begun”.

Saturday, July 13, 2013

हिसाब-किताब

This Post will remain open n I will keep on adding para’s , all these account holders are somehow , sometime , somewhere connected with me , but may not have name or faces .
So dear visitors , pls. keep on searching this post for new additions … enjoy !
I wanted to write something on this topic since long , हिसाब-किताब , may be one day i will , is courageous to write ? may be , who knows , shaayad ..fir kabhi ...OK! Wait then..14.07.13
लिखना शुरू किया था लेकिन बारिश की एक बोछार आयी और सब मिटा कर चली गयी ,खिड़की खुली रह गयी थी , उसकी चिटकनी ख़राब हे , पहले ठीक करा लूँ , फिर से कोशिश करूंगा .
Nishaan:16.07.13
पता लगा की वो २ दिन पहले आई थी हिसाब किताब देख कर गयी ,कुछ निशान छोड़ कर गयी थी , पन्ने गीले से लगे , शायद मरहम था या फिर पानी , अगर के मरहम या पानी था तो किसका , मेरा या उसका , या ऐसा भी हो सकता हे की वो ज्यादा हंसी हो , कई बार वो जब ज्यादा हंसती हे तो भी उसके आंसू निकल आते हैं , शायद , कभी मिलेगी तो पूछुंगा .. Contd ..
हथेली में रेत :
वो एक ज़ज्बा हे एक ज़िन्दगी हे ,उसके साथ हिसाब किताब हमेशा ख़ुशी देता हे
उसके हाथ बहुत छोटे छोटे हैं , प्यारे से , बस चुटकी भर कुछ भी रख दो खुश हो जाती हे , और गिफ्ट के सिर्फ नाम से ही खुश हो जाती हे
लेकिन एक परेशानी भी हे , उसके हाथ छोटे हैं , और वो उसे रेत और पानी की तरह पकडती हे , उसे कुछ भी देने के बाद , बस मुड कर देखो तो हाथ फिर खाली दिखता हे , जैसे की फिर तैयार हे कुछ लेने को .
मुजहे हमेशा लगता हे और विश्वास हे की एक दिन वो सब मुजहे सूद समेत लोटा देगी , और बहुत सारी खुशियाँ देगी , हमेशा सोचता रहता हूँ की उसे क्या और ला कर दूं .
शायद उसके चॉकलेट खाने के शौक ने उसे इतना स्वीट बना दिया हे ..ऑफिस में बेठे हुए बस में उसे कई बार मेसेज भेज देता हूँ                              Oye..
18.07.2013
Parinde :
Café Reminiscence Parinde
सोचता हूँ उसको कोई नाम दूं , क्योंकि पिछले एक महीने से में उसे जानने लगा हूँ , क्योंकि उस परिंदे ( Parrot) की पूँछ कटी हुई हे और वो रोज खाने के लिए कम और सबसे झगड़ने के लिए ज्यादा आता हे .इसलिए शायद वो अच्हा लगता हे ,अब में उससे पहचानता हूँ , लेकिन सोचता हूँ अगर उसे में नाम दे कर पुकारूंगा तॊ क्या वो मुड कर देखेगा , तॊ कोशिश करूं .
लेकिन   पीछे मुड कर नहीं देखा , फिर से   ऐसा हुआ तॊ ? इसलिए बेहतर हे उसे नाम न दिया जाय , उसे क्यों हम इंसानों जैसा बनाऊ , खुश रहने दॊ , जीने दॊ , नाम दूंगा तो उससे उसका सरनेम भी पूछेंगे , बेवजह complication होगी .
18.07.2013
BINDI : 21.072013 :
Disclosure : Inspired from " Maya " fr Ijaazat .
Café Reminiscence
शाम को वापस आके गाडी पार्क करके जैसे ही में लिफ्ट की तरफ जाने लगा वॉचमैन ने बताया वो आई थी वैसे उसका हमेशा उससे वो संभोधन अजीब लगता था , शायद वो उसे वाईफ मेटीरियल नहीं लगती थी ! तो में तेजी से जाने लगा इतने में उसने फिर कहा वो वापस भी गयी मेने पूछा कब ? बताया अभी करीब एक घंटा पहले .| फिर मेने वॉचमैन से पूछा क्या पहना था क्योंकि में जानना चाहता था की वो इस बार किस जगह से आई थी , उसका क्या ठोर ठिकाना , बतया बंजारों जैसा लम्बा कलरफुल लंबा स्कर्ट था और ऊपर कुछ सफ़ेद सा पूरी बाँहों का लेकिन खूब सारे बड़े बड़े मोती और पत्थरों की मालाएं डाल रखी थी , मुजहे समज आया शायद धर्मशाला में होगी ,| ज्यादातर कहीं पहाड़ों पर ही जाती हे या फिर रेगिस्तान   | पूरी खानाबदोश जो हे !
अन्दर आया घर एकदम साफ़ सुथरा कर दिया था , ड्रेसिंग टेबल पर वो लाख के दो कंगन जो उसे उसकी माँ ने उसे दिए थे नहीं थे जबकि मेने कई बार बोला इसे यहीं रहने देना हमेशा , ड्रेसिंग टेबल पर उसकी बड़ी सी लाल बिंदी लगी देखी जो पहले नहीं थी मेरे लिए जानबूज   कर छोड़ गयी  हे  ,कपबोर्ड से कपडे चप्पले ले गयी थी उसका वो ऑरेंज वाइट मफलर तलाश किया जो वो पिछली बार सिक्किम में जब एक अनाथालाये में 6 महीनो तक काम कर रही  थी तो किसी बच्चे ने गिफ्ट किया था नहीं था.
परेशान होकर कुछ वक़्त सोफे पर ही बैठा रहा फिर पानी लेने उठा तो देखा फ्रिज पर 2 पीले post it लगे थे
"घर कितना अस्तव्यस्त रखते हो | वाशिंग मशीन में से तुम्हारी 2 पहनी हुईं टी शर्ट्स ले कर जा रहीं हूँ | कभी याद आओगे तो पहन लिया करूंगी"
" तुम्हारी कुछ नई तस्वीरें देखी थोड़े सफ़ेद बाल में अच्हे लग रहे हो खासकर वो कनपटी वाले ऐसे ही रखो  |
फ्रिज में सैंडविच हैं खा लेना |"

क्या  करूं में उसका ! घर की चाभी छोड़ कर नहीं गयी थी मतलब फिर आ सकती हे , हमेशा ये ही डर बना रहता हे कहीं चाभी न छोड़ जाय , कमसकम उम्मीद तो हे कभी मिलेगी |
शायद ..
Whatsapp : 21.07.2013
Sometime I am feeling it is keeping me engaged , also hurting sometime ,now deleted application  from my mobile. Len Den is not working for me. Lekin ..

Wednesday, July 10, 2013

Soch



रात भर सर्द हवाएं चलती रहीं , तेज बारिश हुई ,कुछ तो नासाज़ तबियत ने कुछ तेज बारिश की आवाज ने सोने नहीं दिया , खिडकियों के खरखराने की आवाजें भी आती रहीं .

वो रात भर टूटी खपरेल के नीचे खाली बर्तन लगाती रही पानी था की रुक ही नहीं रहा था .

मैं लेटे हुए इंतज़ार कर रहा था की कोई तेज हवा का झोंका आये तो मेरे चेहरे पर कुछ पानी के छीटें पड़ें तॊ उन्हें महसूस करूं.

इतने में आवाज़ आयी बचपना छोड़ो और एक और खाली बर्तन ला कर दॊ.

कैसी हो तुम .......


















धुन्दला सा याद हे चेहरा ,किसी नेटवर्क साईट  पर पिक्चर देखी थी कुछ समय पहले , सुन्दर सी थी , शायद पहले से ज्यादा , , लेकिन आँखों के भाव समज नहीं आये , खुश , उदास ,कोशिश तो करी पढने की ,  वैसे भी वो हमेशा ही प्रैक्टिकल थी , स्ट्रोंग , इंडिपेंडेंट , खुशमिजाज़ , संगीत , सिनेमा में इंटरेस्ट था , बातें भी करती थी , शायद ये कॉमन था हमारे बीच , बाकी तो एकदम अलग

कभी मिलेगी तो पूछूंगा : कैसी हो तुम .......

254















काफी अरसे के  बाद जाना हुआ २५४ में , साफ़ सुथरा सा लगा , हरियाली हे लेकिन वो २ आम के  , अमरुद और नींबू के पेड़ अब नहीं रहे , दोपहर ,में गली के बच्चे पत्थर फेंकते होंगे ,बहुत  ढूंडा लेकिन कोई भी पत्थर नहीं मिला सोचा था मिले तॊ अपने साथ ले चलूँ रखूं अपने संदूक में बचा कर
.वाश बेसिन पर डैडी की शेव का वो सफ़ेद साबुन जो प्लास्टिक की डब्बी में आता था , नहीं था . नल ठीक करा लिया होगा नहीं तो वो तो हमेशा ही लीक करता रहता था पीतल की टोंटी की जगह स्टील वाली आ गयी थी ,, याद आया डैडी गीता भी कुर्सी टेबल यूज़ करके नोवेल जैसे पड़ते थे और बस आर्डर देते रहते थॆ , अब दें तॊ दिन भर हाथ बांध कर ही खड़ा रहूँ वहां ,  सिगरी की आग ठंडी हो गयी हो तॊ छू कर देखूं , लेकिन सिगरी भी नहीं .भाई ने  फिर भी संभाल कर रखा हे  सब वो ही,, उषा का बड़ा पंखा , वैसा ही कपडे सुखाने का तार ,Alwyn फ्रिज , रसोई में लगा मां पूछेगी खाना अभी लगा दूँ क्या  , पर.. 

Tuesday, June 25, 2013

शाम से आज आँखों में नमी सी है


Café Reminiscence













मुज्हे उसकी प्रोफाइल pic अचछी लगी तो मेने यूँ ही कहा की एक बस आँखों की तस्वीर भेज दो , क्योंकि उसमे मेने नमी देखी , इतनी कम उम्र में पानी , वो भी हमेशा ? उसने कहा दूसरी क्यों उसे ही crop कर देती हूँ , मेने तॊ बस यूं ही ली थी , तब पता नहीं था की वो एक कहानी बयां करेंगी .

एक बार जब हम धूप में जा रहे थे , उससे कहा चलो तुम्हे Gucci या Dior के गॉगल्स दिलवा देता हूँ , नहीं तो तुम्हारी आँखों की नमी चली जाएगी , उसने मजाक में कहा इतनी सस्ती गिफ्ट्स , देना हे तो कुछ कीमती दो , फिर कहा मुज्हे वो ज्योमेट्री बॉक्स ला दो जैसा आप Sid के लिए लाये थे ,पिंक कलर का जिसमे बटन दबाने पर शार्पनर बाहार आता हे या फिर वो लकड़ी की बेलगाडी जिसे वसंतसेना (Link here) ने अपने गहनों से भर कर उस छोटे बालक को दी थी क्योंकि उस बालक के सब दोस्तों के पास अच्हे अच्हे खिलोने थे और वो रो रहा था , गहनों से सजी उस बेलगाडी पाकर वो बालक बहुत खुश था , तब मेने कहा वो गहनों तो बहुत महंगे होंगे , में कैसे ?

तब वो हंसी और कहा बुद्धू , मुज्हे वो गहने नहीं , उस बालक की वो लकड़ी की बेलगाडी चाहिये , तब में हंसा .

फिर मेने पूछा आँखों में हमेशा नमी क्यों , फिर उसने कहा इस पिक्चर को पहनो मेने उस तस्वीर के प्रिंट को एक चश्मे जैसा पहना , तो एक डाक्यूमेंट्री न्यूज़ जैसा कुछ दिखा , ठीक वैसा ही जैसा में खुद अपनी आँखों से देखता रहता हूँ उन पुरानी यादों को , हमेशा आँखों के सामने आती रहती हैं ,कुछ अच्छी कुछ तकलीफें वाली , ख़ैर

पूरी रील उसने सफ़ेद बैंडेज से लपेट रखी थी जैसे की चोट पर बांधते हैं थोडा खोला तॊ सिर्फ ब्लेंक ही नज़र आया बस कुछ जगह गुलाब के फूलों की पंखुरिया थी कुछ जगह रुई की फाये रखे देखे , कुछ जगह थोड़ी पानी की बुँदे दिखी , मेने कहा मुज्हे तो कुछ दिखा ही नहीं , तब उसने बताया की आपको सिर्फ वो ही नज़र आयगा जो आप से जुड़ा हे , फिर मेने पूछा की वो पंखुरिओं और रुई के फायों का क्या मतलब हे , तब वो मुस्कराई और उसने कुछ भी नहीं कहा ,  बस इतना बताया की वो बूंदें उन बारिशों की हैं जो उसे अचछी लगी तभी उन्हें सहेज के रखा हे ,,..फिर काफी आगे जाने के बाद एक संदूक दिखा , उसे खोला तो उसमे एक गिफ्ट दिखी , तब याद आया जो में बाहर से लाया था शायद ४-५ साल की होगी वो तब , गिफ्ट के पास एक खाली जगह दिखी जिसे उसने रुई के फाये से ढक रखा था बस वो ज्योमेट्री बॉक्स की पिक्चर थी , तब में समझा वो सिद्धार्थ वाले बॉक्स की बात कर रही थी की अब वैसा ही ला दो मुज्हे ...काश तब .


अभी भी जवाब तलाश कर रहा हूँ वो नमी , फाये , .. ब्लेंक ,, शायद कभी ...!

अंदाज़ा भी नहीं था की एक प्रोफाइल तस्वीर भी एक ज़िंदगी बयां कर सकती हे , , लेकिन अब कोशिश करूंगा की वो ज्योमेट्री बॉक्स की जगह खाली ना रहे , सिर्फ उसके ही नहीं जो भी जुड़ा हे किसी न किसी रूप में , किसी भी मोड़ पर , छोटे , बड़े , कोई भी ..



Eye Donation & Reminiscences



मुजहे गुस्सा तो आया जब रिसेप्शनिस्ट ने फॉर्म को Rejected की स्टाम्प लगा कर वापस कर दिया मेने पूछा तब उसने बताया की Eye डोनेशन फॉर्म में आपने नीचे ये क्या लिखा हे ?

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HDD
कुछ सामान

उसने बतया की Eye डोनेशन में हम अभी सिर्फ फॉर्म लेते हैं साथ में कुछ सामान नहीं , और बाद में भी नहीं , फिर उसने पूछा की ये HDD क्या हे मेने उसे बताया Hard Disk Drive , उसने पूछा कितने GB या TB की , मेने बताया हिसाब नहीं , अभी तक जो भी इन आँखों को याद हे वो सब इसमे स्टोर है, ये अलग से नहीं है तो वो तैयार हो गया , फिर उसने पूछा सामान कहाँ है मेने कहा बाहार , वो विजिटिंग चेयर के पास आया , की कहाँ है , मेने बताया बाहार है रोड पर , बाहर आने पर मेने उसे वो ट्रक दिखाया , जिसमे वो सब सामन में लोड करके लाया था , कहा चेक करलो . मजदूर बुलाने पड़ेंगे ..फिर उसने कुछ सामान को चेक किया , ज्यादातर पुराना और टूटा फूटा था , आखिर में पूछा कोई perishable आइटम तो नहीं तब मेने उसे वो पुराना Alwyn का फ्रिज खोल कर दिखाया , उसमे एक रोटी जो माँ सर्दियों के दिनों में सिगड़ी पर बनाती थी , एक सब्जी , एक उनका लेयर वाला परांठा और एक आधा खाया आमलेट , उसने पूछा बाकि तॊ ठीक हे लेकिन ये आमलेट ? तब मेने बताया में मेरा सबसे बड़ा भाई जो एकदम केयरलेस और बेतरतीब है उससे बचा के ये मेने रखा है , यूँ होता था उन दिनों की,, हम दोनों जब एक ही थाली में साथ खाते थे और आमलेट बनता था तॊ में तो हिसाब से खाता था लेकिन बड़ा भाई आधी रोटी में ही एक पूरा आमलेट खा जाता था , उसका कैलकुलेशन मुजहे कभी समज ही नहीं आई .


फिर मेने उसे बतया की ये सामन साथ में डोनेट करना जरूरी है नहीं तो मेरी आँखें इन्हे ही तलाशती रहेंगी , फिर वो मुजहे एक शानदार से ठन्डे बड़े कमरे में ले गया जहाँ पोस्ट ऑफिस में अन्दर जैसे होते हैं वैसे ही छोटे छोटे Bins बने थे सिर्फ 2 उँगलियाँ ही जा सकती हैं , वो बोला अगर तुम ट्रक का सारा सामान कॉम्पैक्ट करके इस साइज़ का बना दो तो वो फॉर्म एक्सेप्ट कर लेंगे , मेने भी सोचा कुछ आने वाले सालों में हो सकता हे कोई नयी टेक्नोलॉजी आ जाये जो सामान को एकदम छोटा कर दे..जैसे US में पुरानी कारों को बॉक्स जैसा बन देते हैं .

Still Waiting!

कंचे :(Marbles)

Poem or short story ??  : Whatever ...


धुन्दला सा याद हे वो लड़का पतला दुबला सा था , उसके बाल हमेशा सामने रहते थे , शायद कंघी करने की जरूरत ही नहीं थी या वो करता होगा लेकिन वो सामने ही आ जाते होंगे , कभी लम्बे बाल होते थे तॊ आँखों तक आ जाते थे , उसे मेने ज्यादातर एक काली निकर में देखा था जिसमे उल्टा V कट बना था दोनों  साईड पर , ऐसा नहीं की वो हमेशा वो ही पहनता था लेकिन वो ही अक्स याद हे एक बार  मेने उससे पूछा भी तॊ उसने बताया उसके पास दो सैम टू सैम निकर  हैं और उनकी जेबें बड़ी हैं और उसे पसंद हे , कई बार उसकी बुश्कोट के बटन ऊपर नीचे भी रहते थे ,

वो तपती दोपहरी  में घर के बरामदे से चुपचाप निकल जाता था चप्पल पहन कर दोनों जेबों  में खूब सारे कंचे भर कर , नीले हरे , पीले , सफ़ेद और पानी जैसे भी होते थे और उनमे एक बड़ा कंचा भी होता था वो कुछ सेट जैसा था जैसे पचास में एक बड़ा , हाँ लाल रंग कम होता था , उसकी जेबें उन मट्टी से सने कंचों से भर जाती थी , कुछ हार जीत का खेल भी होता था शायद , You Tube या Google में देखूँगा वो तो आजकल अलादीन की तरह हे कुछ भी मांगो यानि ढ्ँढो सब  मिलता हे की क्या  खेल  था वो शायद सर्च में मिल जाये हो सकता हे उस लड़के की कोई तस्वीर ही मिल जाये , जेब में कंचे और आँखों तक बाल .

माँ उसे धूप में खेलने पर बहुत डाँट़ती थी लेकिन उसकी बहने उसे बचा लेती थीं पढने में ठीक था ,लेकिन दोपहर में खलेने  पर डाँट़ तो पढनी ही थी , मुझे बाद में समझ में आया की वो इको साउंड में उसके दोस्त उसे क्या आवाजें लगाते  थे दोपहर में , सोचते थे कोई नहीं सम्झेगा, अब हंसी  आती हे उनकी उस  बचपन  की बेफकूफी भरी सोच पर .. अब मुझे लगता हे की मुज्हे भी कोई ऐसी आवाज  लगाये , कई  बार सोते हुए लगता हे वो ही आवाज हे खिड़की खोलता हूँ  तो सिर्फ  गाडिओं की और किसीके  टीवी चलने  की आवाज सुनाई देती  हे वो इको साउंड वाली आवाज कहीं खो गयी .

इंतज़ार में हूँ की वो लड़का कभी फिर दीखे और में उससे पूंछू की वो क्या पुकारते थे उसका MP3  मिल जाय तो उसे कालर tune बना कर सहेज कर रख लूं जब भी कभी अकेला  होऊं तो उसे रीप्ले कर लूं  और लोट जाऊं  उन दिनों में जब तपती दोपहर भी सुहानी लगती थी , सोचता हूँ क्यों  नहीं AC  में वो आप्शन मिल जाय की एक बटन हो जिस  पर लिखा  हो धूप और केलिन्डर सेट करो और वो पुरानी धूप कमरे  में बिखर जाय और में  पलंग से उतरूं कारपेट हटाऊं और नंगे पांव फर्श पर रखूँ तो वो वैसे ही जलें  जैसे की उन दिनों जलते  थे .

वो लड़का कभी मिल जाय  तो  उससे किसी भी कीमत पर वो मट्टी में सने हुए कंचे खरीद लूँ और उन्हें छु कर देखूं , आज कल हाथ मट्टी से गंदे ही नहीं होते कभी गंदे होते भी हैं तो बस पेट्रोल की स्मेल आती हे., और फिर उससे वो टूटी हुई कांच की चुडिओं के टुकड़े   भी ले लूं जिन्हें  वो माँ से मार  खाने  के बाद टूटने  पर संभाल कर अपने ज्योमेट्री बॉक्स में रख लेता  था सहेज कर., वो कंचे और चुडिओं के टुकडो को में अपने शेल्फ   में रखे    Swarovski के सेट को हटा कर उनकी जगह   रख दूँ .

वो लड़का ..........

Monday, October 8, 2012

Hold my hand

Café Reminiscence :Hold my Hand
Hold my hand By Prachi

















During our usual weekend long drives , we accidentally clicked this pic , place is Shahpur ( Asangaon ) 70 KM from Bombay , we were enjoying greenery overlooking Sahyadri mountain range , then suddenly we found this little boy walking & holding his mother's hand , such  casual carefree walk n mountains in the background.

Monday, February 13, 2012

Reversible



रिश्ते और समय अगर reversible  होते , तो मैं reverse कर देता कई रिश्तों को ,कई पलों को ,
समेट कर रख लेता कईओं को , जो चले गए , छूट गए , रोक लेता उन्हें उस वक़्त या reverse कर लेता.


कुछ और देर देख लेता माँ के सफ़ेद बालों को , शिकायत भी ना करता की बाल हमेशा बिखरे क्यों रहते हैं , बनाती क्यों नहीं , क्यों आज भी कोई  बूढ़ी  दिखती हे तो क्यों बालों पर ही ध्यान जाता हे ,
क्या  ढूँढता हूँ   मैं उनमे .
इसलिए आज मन करता हे टुकुर के बाल बनाऊं , शायद कमी रह गयी थी तब जो अब सोचता हूँ पूरी  करू
क्यों नहीं कोशिश करी कभी तुम्हारे बल संवारने की उस वक़्त
हमेशा इंतज़ार किया तुम्हारे शाम को स्कूल से वापस लोटने का , हमेशा वो फल हाथों से ले लिए ,
क्यों नहीं छू कर देखा उन झूरी वाले हाथों  को जो वज़न उठाने से लाल हो जाते थे
तब  देखता तो शायद वो लकीरें भी देख पाता जो छोटी होती जा रही थी
पड़ पाता तो शायद कोशिश करता उन्हें और लम्बा करने का


याद हे दसवीं की मार जब पढने के बजाय  मैं  कंचे खेल रहा था , शायद हाथों से ही मारा था
पीठ पर आज भी  ढूँढता  हूँ की शायद कोई निशान मिल जाय , अच्हा होता की अगर थोडा और जोर से या बेंत से मारा होता तो निशान पड़ते , तो कम से कम आज उन्हें स्पर्श करके तुम्हारा अहसास तो कर लेता .
बस तुम्हारी  शाल हे , जो कभी कभी ओड लेता हूँ.


कुछ दर्द तो अच्हे भी लगते हैं भले ही तकलीफ दें तो उनको भी क्या reverse करता , अगर सभी अच्हे होते तो फिर याद क्यों आते क्यों सामने आके खड़े ह़ो जाते बार बार .
अगर सब अच्हा होता तो कुछ यादें ही ना होती
अगर कुछ तकलीफें ना होती कुछ कमी नहीं होती तो कैसे कई दुसरे रिश्ते संभाल पाता में
और अगर अच्हे रिश्ते  reverse ह़ो जाते , तो  शायद ज्यादा तकलीफ देते .
तो ये ही अच्हा हे रिश्तों को वैसे ही रहने दिया जाये जैसे हैं

Poem by me 

Sunday, February 12, 2012

रेत



Café Reminiscence , Ret , Poem












सोचा  था  मुट्ठी  में  कुछ  यादों  को  ले   कर  कुछ  दूर  चलूँ
थोड़ी दूर चल कर देखा  तो पाया वो सब कब हाथों से फिसल गए जैसे की मुट्ठी से रेत , की पता ही नहीं चला .
रह गया फिर वो ही खालीपन ,मुठी रही खाली की खाली ,
बस उन यादों के कुछ पल चिपके  रह गए रेत के कुछ कणों की तरह .
शायद वो बचे हुए पल ही थे जो मेरे अपने थे , तो वो जो बाकि जो छूठ गए थे वो किसके थे
सोचा तो पाया की वो थे तो मेरे ही लेकिन शायद उन पर मेरा उतना हक ही नहीं  था .
या मेने बेवजह कोशिश करी उन्हें साथ लेकर चलने की ,
रेत को भी कभी भला कोई बांध कर  चल पाया हे कोई .
मुट्ठी को जितना जोर से दबाओगे  तो रेत उतनी ही तेजी से फिसलेगी , और निशान छोड़  जाएँगी
फिर सोचा जाने दो वो रेत के कण ही तो थे ,वो हाथों की लकीरें तो नहीं बदल पाएंगे , 
शायद वो थे ही नहीं उन लकीरों में कभी भी , 
या शायद सिर्फ ह़ो  थोड़ी  देर  के  लिए  ही , 
हाथों  में बहुत सी छोटी लकीरें थोड़े ही दिखती हैं 
शायद वो भी हो कहीं उन छोटी लकीरों में    शायद  ..
वो हमेशा ही रहे होँ मेरी destiny का एक हिस्सा बन कर , उतना ही वजूद रहा हो उनका मेरे लिए ,,, शायद .


सोचा  था मुड कर ना देखूं , ना ही ढूँढू उन रेत के कणों को , भला वो भी कभी मिले हें किसीको वापस .
फिर सोचा चलो आगे बड़ो  ,कुछ पल तो हें यादों  के आखिर साथ में  जिन्हें मेने संभाल कर रखा हे पुडिया में बांध कर ,
रेत के कणों के रूप में.

Poem by Me 

Friday, January 20, 2012

Poems : Gulzar : गुलज़ार साहेब के पतीले से

Gulzar as a Poet : 

Gulzar, Dev Anand , Alaav , Poem














Some of the selective poems :Pic. Dev Anand with Gulzar , pleasure to see them together at least on stage.

ALAAV :

रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने अलाव तापा
मैंने माजी से कई खुश्क सी शाखें काटीं
तुमने भी गुजरे हुये लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखीं नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाये हुये खत खोलें
अपनी इन आंखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
तुमने पलकों पे नामी सूख गयी थी, सो गिरा दी |
रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
काट के दाल दिया जलाते अलावों में उसे
रात भर फून्कों से हर लोऊ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने |

शहरनामे :

बम्बई

यहां जीना भी जादू है
यहां पर ख्वाब भी टांगों पे चलते हैं
उमंगें फूटती हैं, जिस तरह पानी मे रक्खे मूंग के दाने
चटखते हैं तो जीभें उगने लगती हैं
यहां दिल खर्च हो जाते हैं अक्सर कुछ नहीं बचता

न्यूयार्क

तुम्हारे शहर में ए दोस्त
क्यूं कर च्युंटियों के घर नहीं हैं
कहीं भी चीटियां नहीं देखी मैने
अगरचे फ़र्श पे चीनी भी डाली
पर कोइ चीटीं नज़र नहीं आयी
हमारे गांव के घर में तो आटा डालते हैं, गर
कोइ क़तार उनकी नज़र आये

Phir Koi Nazm Kahen :

आओ  फिर  नज़्म  कहें 
फिर  किसी  दर्द  को  सहला  के  सुजा  ले  ऑंखें
फिर  किसी  दुखती  राग  से  छुआ  दे  नश्तर
या  किसी  भूली  हुई  राह  पे  मुड़कर 
एक  बार  नाम  लेकर  किसी  हमनाम  को  आवाज़  ही  दे  ले
फिर  कोई  नज़्म  कहें

शाम से आँख में नमी सी है

आज फिर आपकी कमी सी है
दफ़्न कर दो हमें कि साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
इसकी आदत भी आदमी सी है
कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है

मेरे रौशनदार में बैठा एक कबूतर

जब अपनी मादा से गुटरगूँ कहता है
लगता है मेरे बारे में, उसने कोई बात कही।
शायद मेरा यूँ कमरे में आना और मुख़ल होना
उनको नावाजिब लगता है।
उनका घर है रौशनदान में
और मैं एक पड़ोसी हूँ

ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा

क़ाफिला साथ और सफ़र तन्हा
अपने साये से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा
रात भर बोलते हैं सन्नाटे
रात काटे कोई किधर तन्हा
दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती नहीं बसर तन्हा
हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फिर न जाने गए किधर तन्हा

Triveni:

तुम्हारे होंठ बहुत खु़श्क खु़श्क रहते हैं
इन्हीं लबों पे कभी ताज़ा शे’र मिलते थे
ये तुमने होंठों पे अफसाने रख लिये कब से?



कुछ इस तरह ख्‍़याल तेरा जल उठा कि बस
जैसे दीया-सलाई जली हो अँधेरे में
अब फूंक भी दो,वरना ये उंगली जलाएगा!


कांटे वाली तार पे किसने गीले कपड़े टांगे हैं
ख़ून टपकता रहता है और नाली में बह जाता है
क्यों इस फौ़जी की बेवा हर रोज़ ये वर्दी धोती है।



न जाने क्या था, जो कहना था

न जाने क्या था, जो कहना था
आज मिल के तुझे
तुझे मिला था मगर, जाने क्या कहा मैंने

वो एक बात जो सोची थी तुझसे कह दूँगा

तुझे मिला तो लगा, वो भी कह चुका हूँ कभी
जाने क्या, ना जाने क्या था
जो कहना था आज मिल के तुझे

कुछ ऐसी बातें जो तुझसे कही नहीं हैं मगर
कुछ ऐसा लगता है तुझसे कभी कही होंगी
तेरे ख़याल से ग़ाफ़िल नहीं हूँ तेरी क़सम

तेरे ख़यालों में कुछ भूल-भूल जाता हूँ
जाने क्या, ना जाने क्या था जो कहना था
आज मिल के तुझे जाने क्या…


तेरा बे को दबा कर बात करना
Wow ! पर होठों का छल्ला गोल होकर घूम जाता था

तेरी आवाज़, को काग़ज़ पे रखके, मैंने चाहा था कि पिन कर लूँ
कि जैसे तितलियों के पर लगा लेता है कोई अपनी एलबम में


Pancham : RD Burman

याद है बारिशों का दिन, पंचम

याद है जब पहाड़ी के नीचे वादी में
धुंध से झांककर निकलती हुई
रेल की पटरियां गुज़रती थीं
धुंध में ऐसे लग रहे थे हम
जैसे दो पौधे पास बैठे हों
हम बहुत देर तक वहां बैठे
उस मुसाफिर का जिक्र करते रहे
जिसको आना था पिछली शब, लेकिन
उसकी आमद का वक्‍त टलता रहा
देर तक पटरियों पर बैठे हुए
रेल का इंतज़ार करते रहे
रेल आई ना उसका वक्‍त हुआ
और तुम, यूं ही दो क़दम चलकर
धुंध पर पांव रखके चल भी दिए

मैं अकेला हूं धुंध में 'पंचम'...



आम

मोड़ पे देखा है वो बूढ़ा-सा इक आम का पेड़ कभी?
मेरा वाकिफ़ है बहुत सालों से, मैं जानता हूँ

जब मैं छोटा था तो इक आम चुराने के लिए
परली दीवार से कंधों पे चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किस शाख से मेरा पाँव लगा
धाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर

मेरी शादी पे मुझे याद है शाखें देकर
मेरी वेदी का हवन गरम किया था उसने
और जब हामला थी बीबा, तो दोपहर में हर दिन
मेरी बीवी की तरफ़ कैरियाँ फेंकी थी उसी ने

वक़्त के साथ सभी फूल, सभी पत्ते गए

तब भी लजाता था जब मुन्ने से कहती बीबा
'हाँ उसी पेड़ से आया है तू, पेड़ का फल है।'

अब भी लजाता हूँ, जब मोड़ से गुज़रता हूँ
खाँस कर कहता है,"क्यूँ, सर के सभी बाल गए?"

सुबह से काट रहे हैं वो कमेटी वाले
मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको!

मकान की ऊपरी मंज़िल पर

मेरी मंज़िल पे मेरे सामने
मेहमानखाना है, मेरे पोते कभी
अमरीका से आये तो रुकते हैं
अलग साइज़ में आते हैं वो जितनी बार आते
हैं, ख़ुदा जाने वही आते हैं या
हर बार कोई दूसरा आता है

बस्ता फ़ेंक के

बस्ता फ़ेंक के लोची भागा रोशनआरा बाग़ की जानिब
चिल्लाता : 'चल गुड्डी चल'
पक्के जामुन टपकेंगे'

आँगन की रस्सी से माँ ने कपड़े खोले
और तंदूर पे लाके टीन की चादर डाली

सारे दिन के सूखे पापड़
लच्छी ने लिपटा ई चादर
'बच गई रब्बा' किया कराया धुल जाना था'

ख़ैरु ने अपने खेतों की सूखी मिट्टी
झुर्रियों वाले हाथ में ले कर
भीगी-भीगी आँखों से फिर ऊपर देखा

झूम के फिर उट्ठे हैं बादल
टूट के फिर मेंह बरसेगा

दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म : गुलज़ार


दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म
जैसे जंगल में शाम के साये
जाते-जाते सहम के रुक जाएँ
मुडके देखे उदास राहों पर
कैसे बुझते हुए उजालों में
दूर तक धूल ही धूल उडती है

Maa: माँ

तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं

ढूँढा करता हूं तुम्हें
अपने चेहरे में ही कहीं

लोग कहते हैं
मेरी आँखें मेरी माँ सी हैं

यूं तो लबरेज़ हैं पानी से
मगर प्यासी हैं

कान में छेद है
पैदायशी आया होगा
तूने मन्नत के लिये
कान छिदाया होगा

सामने दाँतों का वक़्फा है
तेरे भी होगा
एक चक्कर
तेरे पाँव के तले भी होगा

जाने किस जल्दी में थी
जन्म दिया, दौड़ गयी
क्या खुदा देख लिया था
कि मुझे छोड़ गयी

मेल के देखता हूं
मिल ही जाए तुझसी कहीं
तेरे बिन ओपरी लगती है
मुझे सारी जमीं

तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं

Kitab :Vip underwear

a aa i ee, a aa e e, maastarji ki aa gayi chitthi,
taap chadhe to kambal taan, VIP, VIP underwear baniyaan

Sunday, February 13, 2011

Hum Dono re release in color

Hum Dono : Dev Anand
Café Reminiscence


















Watched Hum Dono  yesterday , gr8 , old magic by Sahir , delighted to watch  young Dev.
,also Sadhna's sacrificial role & her acting .
Real Locations , old house , old temple , all look realistic .
Famous cig Lighter .
Enjoyed !!



Link : Hum Dono re release in colour

Monday, September 27, 2010

तेरे ख़त :राजेन्द्रनाथ 'रहबर'/Jagjit Singh.

Rishtey, तेरे ख़त
Café Reminiscence
तेरी ख़ुशबू में बसे ख़त मै जलाता कैसे - राजेन्द्रनाथ 'रहबर'










प्यार की आख़री पूँजी भी लुटा आया हूँ
अपनी हस्ती को भी लगता है मिटा आया हूँ
उम्र भर की जो कमाई थी गँवा आया हूँ
तेरे ख़त आज मै गंगा में बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ

तूने लिखा था जला डालूं मै तेरी तहरीरें
तूने चाहा था जला डालूं मै तेरी तस्वीरें
सोच ली मैने मगर और ही कुछ तदबीरें
तेरे ख़त आज मै गंगा में बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ

तेरी ख़ुशबू में बसे ख़त मै जलाता कैसे
प्यार में ड़ूबे हुए ख़त मै जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे ख़त मै जलाता कैसे
तेरे ख़त आज मै गंगा में बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ

जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाए रखा
जिन को एक उम्र कलेजे से लगाए रखा
दीन जिनको जिन्हे ईमान बनाए रखा

जिनका हर लफ़्ज़ मुझे याद था पानी की तरह
याद थे मुझको जो पैग़ाम-ए-ज़ुबानी की तरह
मुझको प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह

तूने दुनिया की निगाहों से जो बचाकर लिखे
सालहासाल मेरे नाम बराबर लिखे
कभी दिन में तो कभी रात में उठकर लिखे

तेरे रुमाल तेरे ख़त तेरे छल्ले भी गये
तेरी तस्वीरें तेरे शोख़ लिफ़ाफ़े भी गये
एक युग खत्म हुआ युग के फ़साने भी गये
तेरे ख़त आज मै गंगा में बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ

कितना बेचैन उन्हे लेने को गंगाजल था
जो भी धरा था उन्ही के लिये वो बेकल था
प्यार अपना भी तो गंगा की तरह निर्मल था
तेरे ख़त आज मै गंगा में बहा आया हूँ
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ

Sunday, September 7, 2008

Gata Rahe Mera Dil : Guide

Guide : Dev Anand , Gata Rahe Mera Dil

Guide : Dev Anand , Gata Rahe Mera Dil














Timeless romantic song.Won Filmfare award that yr.
Dev Anand has distinctive style of embracing women , loosely cross his hands above women shoulders , as seen in this song , also in Tere Mere Sapne....
Also class scene Waheeda is putting her hands on Dev shoulders while climbing up.
Well dressed Red Sweater , pink Sari , still look good in today's terms.
Goldie direction of this divine movie is beyond comparison & popular even after 45 yrs.
Waheeda was advised by her close one's ,not to do this film , as Roji character might harm her image.
Result : Guide was a block buster ,her acting was also critically acclaimed with Dev, also won best actress filmfare award .
Movie is also personally close to her , as expressed in many interviews.


Link :Gata Rahe Mera Dil : Guide

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